देश के किसी भी सूबे में चुनावी समर में स्टार प्रचारकों का दौर शुरू होते ही सोशल मीडिया पर जिस शख्स की तस्वीर सबसे ज्यादा तैरती है उसका नाम इमरान प्रतापगढ़ी है। मुशायरों के इतिहास में सबसे ज्यादा ऑडियंस और दीवानगी समेटने वाले इस चर्चित चेहरे की पर्सनैलिटी, इसकी आवाज़ और इसका लहजा ये तीनों चीज़ें मिलकर रात के किसी पहर में, शहर के किसी हिस्से में हजारों की भीड़ के बीच ऐसा जादू बिखेरती थी की माहौल इंकलाब के नारों से गूंज उठता था।

कारवां मुशायरों से होता हुआ आंदोलनों और सामाजिक भागीदारी तक़ पहुंच चुका था, केंद्र में भाजपा की सत्ता आने के बाद देश के सामाजिक ताने बाने, गंगा-जमुनी तहजीब और संवैधानिक मूल्यों को तोड़ने के मंसूबों के साथ एक विचारधारा बड़ी तेजी के साथ उठ खड़ी होनी शुरू हुई थी, देश में लिंचिग जैसी वारदातें होनी शुरू हो गई थी और तब एक टूटी फूटी कोशिश के साथ देश के इतिहास में अपनी तरह का एक अनोखा विरोध दर्ज किया गया था की देश के मुसलमानों ने उन दिनों लिंचिग के खिलाफ ईद की नमाज़ के दिन बांह पर काली पट्टी बांधकर एक अनोखा विरोध दर्ज कराया था जिसको इसी नौजवान शायर ने लीड किया था।

इसके कुछ ही महीनों बाद दिल्ली के जंतर मंतर पर लिंचिग की ऐसी ही वारदातों के खिलाफ़ इमरान की ही अगुआई में “लहू बोल रहा है” नाम से एक और आंदोलन वजूद में आया जिसमें देश के अलग-अलग हिस्सों से दिल्ली पहुंचे सैकड़ों लोगों ने रक्तदान करके लिंचिग के खिलाफ़ अनूठा विरोध दर्ज कराया, विरोध के इस अनूठे और मानवीय तरीके को देश भर में सराहा गया।

इमरान की इन सब कोशिशों के बाद उनके प्रशंसक और चाहने वाले उनके भीतर एक ऐसे किरदार को गढ़ता हुआ देखने लगे थे, जो मज़लूमों का हमदर्द बनकर उनका दर्द बांट रहा था, जो लिंचिग पीड़ितों से मिलकर उनको ढांढस बंधा रहा था, जो सांप्रदायिकता के दैत्यों के आगे छाती ताने मुखर होकर खड़ा था, जो राजनीतिक मामलों पर बेबाक टिप्पणियां कर रहा था, जो बिहार जाकर बाढ़ पीड़ितों के बीच खड़ा नज़र आता था, जो लिंचिग पीड़ितों के लिये क्राउडफंडिंग करके उनकी मदद का ज़रिया बनता था, जिसके अंदर एक बेचैनी सी नज़र आती थी हर उस मुद्दे के लिये जो देश के संवैधानिक उसूलों, देश के आपसी भाईचारे और सामाजिक सौहार्द के लिये नुकसानदायक होते थे।

इस बीच उन्हें तमाम राजनैतिक पार्टियों से जोड़ा जाने लगा, कभी उनके सपा में शामिल होने की अटकलें चलीं तो कभी आम आदमी पार्टी द्वारा राज्य सभा में भेजे जाने की चर्चाएं सुर्खियां बनी, तो कभी राजद के किसी कार्यक्रम में नज़र आने के बाद लालू और तेजस्वी से उनकी नज़दीकियों से कयासों का दौर चला। पर इन सबके बीच 2017-18 में उनकी चर्चा तुगलक लेन के उस बंगले तक़ पहुंच गई जो देश की राजनीति का एक प्रमुख ठिकाना थी। राहुल और प्रियंका से मुलाक़ातों के कई दौर के बाद इमरान की राजनीतिक पारी को लेकर बहोत हद तक़ चीज़ें साफ़ हो चुकी थी। इमरान अब शायर इमरान के साथ-साथ कांग्रेस नेता और मशहूर शायर इमरान प्रतापगढ़ी बन चुके थे।

2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने उन्हें उत्तर प्रदेश की चर्चित मुरादाबाद लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया, सपा-बसपा गठबंधन की लहर के बावजूद इमरान ने देश भर का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा और आख़िर समय तक़ मुकाबले को हाई वोल्टेज बनाए रखा। इस चुनाव का नतीजा जो भी रहा हो पर इमरान मुरादाबाद से एक मंझे हुए नेता बनकर बाहर निकले।

लोकसभा चुनावों के बाद कांग्रेस पार्टी ने भी उनकी लोकप्रियता को जमकर भुनाने का काम किया, कांग्रेस स्टार प्रचारकों की सूची में उनका नाम जरूरी सा हो गया। बिहार में महागठबंधन के प्रत्याशियों के लिये की गई उनकी जनसभाओं ने राजनीतिक रैलियों में भीड़ का एक अलग ही नज़ारा पेश किया। मुशायरों से राजनीति का रुख करने के बावजूद उनकी दीवानगी, उनकी लोकप्रियता बरकरार रही। उनके भाषण आवाम और राजनीतिक पार्टी को किसी पुल की तरह जोड़ने का काम करते हैं। उनकी बातों का असर चुनावी रैलियों और जनसभाओं से गलियों मोहल्लों चौक चर्चाओं से लोगों के घरों तक़ का सफ़र तय करता है।

उनकी राजनीतिक सक्रियता और राहुल प्रियंका से उनकी नज़दीकियों से एक बात तो तय है की कांग्रेस पार्टी में उनके लिये कोई बड़ा किरदार तय होने वाला है, और इस बात का भी प्रबल संभावना है की आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में वो मुस्लिम प्रभाव वाली सीटों पर कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे बनकर उभरने वाले हैं। और इस बात की भी संभावना है की उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के पहले कांग्रेस उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी सौंप कर उनकी उपयोगिता को और भी ज्यादा कारगर बना दे।