प्रकृति ने ही दिया है सब कुछ,प्रकृति के पास खजाना है !
हमने प्रकृति से ही पाया है, सब प्रकृति को ही लौटाना है !!

प्रकृति के सब्ज़ उपहारों को ऐसे भी ना कोई बरबाद करे !
अपशिष्टों को ना भी मिटाये उन्हे भी संजोकर खाद.करे !
लौटाओ प्रकृति का ऋण हो उऋण वापस अगर पाना है !
हमने प्रकृति से ही पाया है,.सब प्रकृति को ही लौटाना है !!

आज उर्वरता धरा की नग्न है रिक्त होती हुयी है वसुन्धरा !
लिया है तो देना भी सीख ले ,कायम कर अब ये परम्परा !
प्रकृति से आया है सब कुछ वो.वापस उसको ही जाना है !
हमने प्रकृति से जो पाया है सब प्रकृति को ही लौटाना है !!

हस्र क्या होगा उस बाग का ,जिसका कोई माली ना हो !
और बढ़ेगी ये उष्णता ,यदि हर सिम्त ना ये हरियाली हो !
स्वच्छ सारा देश हो ,हमें मिलकर ये अभियान चलाना है !
हमने प्रकृति से जो पाया है सब प्रकृती को ही लौटाना है !!

देश तो ये आलीशान है , तो शालीन हो अपनी भी हरकत !
शुन्यता में फैकने की आदत छोड़ दो अपना कूड़ा करकट !
कचरे के समुचित प्रबन्धन का,आव्हान हमें अब जगाना है !
हमने प्रकृति से जो पाया है सब प्रकृति को ही लौटाना है !!

@ डॉ.नर्मदेश्वर प्रसाद चौधरी
मुज़फ़्फ़रपुर , बिहार