आज का समाज आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जैसे विकास के मामले में बहुत आगे बढ़ चुका है। आज का दौर डिजिटल का दौर हैं। जहां पर हर एक व्यक्ति अपनी राय रख सकता है। खुल कर अपनी समस्याओं पर बोल सकता है लिख सकता है। लेकिन आज भी कुछ ऐसी चीजें हैं जिसपर लोग बोलने से लिखने से कतराते हैं। शर्मिंदगी महसूस करते हैं। प्रमुख रूप से भारत में पीरियड्स और पोर्न को लेकर तो ये धारणा बनी हुई है। भारत में आज भी इसपर बात करने से लोग कतराते हैं।

एक दिलचस्प आंकड़ा ये भी है कि पोर्न हब वेबसाइट के एक सर्वे के मुताबिक सबसे अधिक पोर्न वीडियो देखने के मामले में भारत चौथे नंबर पर है। वहीं दुनिया में सबसे अधिक पोर्न वीडियो देखने वाले 10 शहरों में 6 शहर सिर्फ भारत के हैं। भारत में प्रत्येक यूजर प्रतिदिन 8 मिनट 23 सेकेंड पोर्न वीडियो देखता है।

सबसे दिलचस्प आंकड़ा तो ये है कि भारत में महिलाएं भी हस्तमैथुन करती हैं वाइब्रेटर और डिल्डो यूज करती है। पोर्न वीडियो देखती हैं। ये गलत भी नहीं हैं ये उनका अधिकार है। पोर्नहब वेबसाइट के एक हालिया सर्वे के अनुसार पोर्न देखने वालों में एक-तिहाई महिलाएं हैं, और यह अनुपात दिन पर दिन बढ़ रहा है। सर्वे के मुताबिक 30 फीसदी नियमित पोर्न कंज्यूमर महिलाएं ही हैं। ब्राजील और फिलिपींस के बाद भारत की महिलाएं दुनिया के अन्य किसी भी देश की तुलना में ज्यादा पोर्न देखती हैं।

फिर भी हमारा समाज पीरियड्स जैसे जटिल मुद्दों पर खुल कर नहीं बोलता। आज भी भारत में ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं सेनेटरी पेड बहुत कम उपयोग करती है। इसी को लेकर अक्षय कुमार की एक फिल्म भी आई थी, पेडमैन। ताकि लोगों को जागरूक किया जा सके। लेकिन आज भी लाखो ऐसी कई औरतें हैं जो पीरियड होने पर किचन में पांव तक नहीं रखती और तो और इसके बारें में बात करना उनके लिए शायद सेक्स करने से भी ज्यादा शर्मनाक है।

स्कूल, कॉलेजों में आज भी पीरियड्स के टॉपिक पर लड़कियाँ शांत हो जाती हैं और लड़के उनका मज़ाक उड़ाते हैं। लड़के लड़कियों के बेग में पैड देखकर या स्कर्ट पर ब्लड स्टेन देखकर उनको तंग करते हैं, मज़ाक बनाते हैं। यहां तक कि कुछ महिलाएं खुद ही पैड को या ब्लड स्टेम को छिपाने की कोशिश करती हैं ताकि किसी को पता ना चले कि उन्हें पीरियड्स हो रहे हैं।

WHO के 2017 के सर्वें के अनुसार 45 प्रतिशत लड़कियां आज भी पीरियड को एक टेबू मानती हैं। 45 प्रतिशत लड़कियां/महिलाएं का पैड नहीं खरीद सकती और बाकी लड़कियां पैड के बजाए कपड़ा यूज़ करना ही बेहतर समझती हैं। आज हमें सोचना होगा कि हमारा समाज हमारा देश महिलाओं के हक की बराबरी की बात करता है फिर भी ऐसे मुद्दों पर बात करना नॉर्मल क्यों नहीं समझता। आज भी हमारे देश में कई ऐसे मंदिर हैं जहां पीरियड्स के दौरान महिलाओं की प्रवेश पर वर्जित है।

मैं इस मुद्दे पर अपने कई महिला दोस्तों से बात किया तो वे बताती हैं कि पीरियड्स तो उन्हें भी अच्छा नहीं लगता, वे कहती हैं कौन ऐसी महिला होगी जो पूरे शरीर में दर्द, जकड़न, ऐंठन पसंद करेगी, चिड़चिड़ा होना पसंद करेगी लेकिन मजबूरी है जिसे रोकना किसी भी महिला के हाथों में नहीं है लोग इस बात को अब तक नहीं समझ पा रहें हैं। अगर किसी को कह दिए तो मजाक उड़ा देते हैं।

(ये लेख दीपक राजसुमन के निजी विचार है)