आज देश के किसी भी हिस्से को उठा कर देख लीजिए चारों तरफ रोते बिलखते हुए लोग दिख जाएंगे। कहीं कोई बीच सड़क पर ऑक्सीजन सिलेंडर रखकर सांस लेते मरीज दिख जाएंगे। कहीं ऑटो रिक्शा पर बैठी मां के चरणों में बेटे की लाश तो कहीं साइकल पर अपनी पत्नी की लाश को ले जाते हुए इस देश के लोगों का दर्द दिख जाएंगे। क्या इसके लिए जनता जिम्मेदार है? क्या इसके सरकार जिम्मेदार है? क्या इसके लिए चुनाव आयोग जिम्मेदार है? क्या इसके लिए उच्च न्यायालय जिम्मेदार है?

सरकार की माने तो कोरोना की दूसरी लहर के लिए जनता जिम्मेदार है क्योंकि लोगों ने कोरोना गाइडलाइन का पालन नहीं किया। भले देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, कई राज्यों के मुख्यमंत्री और देश के जिम्मेदार होनहार नेताजी लाखों लोगों की भीड़ इक्कठा करके रैली करते रहे।

अभी हाल में मद्रास हाई कोर्ट ने विधानसभा चुनाव को लेकर कहा की चुनाव आयोग पर क्यों नहीं हत्या के केस दर्ज होना चाहिए। अब अगर मद्रास हाई कोर्ट की बातों को माना जाए तो फिर सुप्रीम कोर्ट के जजों, इलाहाबाद हाई कोर्ट के जजों और चुनाव आयोग पर एफआईआर दर्ज होनी चाहिए क्योंकि उस हिसाब से कोरोना संक्रमण के चलते हुए मौतों का जिम्मेदार ये लोग भी है।

अगर हम पिछले साल हुए बिहार विधानसभा चुनाव को देखे तो उस वक्त भी बिहार विधानसभा चुनाव को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर किया गया था जिसकी सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था की हम कोरोना के लिए चुनाव नहीं रोक सकते। वहीं यूपी में पंचायत चुनाव करवाने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आदेश दिया जिसकी वजह से 550 से अधिक शिक्षकों और चुनाव कर्मी की कोरोना से मौत हो गई। अब दो दिन पहले मद्रास हाई कोर्ट ने कहा की कोरोना की दूसरी लहर के लिए चुनाव आयोग जिम्मेदार। उसपर हत्या के केस चलना चाहिए।

अब बड़ा सवाल ये है की तीनो फैसले का संबंध चुनाव से ही था फिर कोर्ट का अलग अलग राय कैसे। आज पूरा देश इस वायरस से परेशान है हजारों लोग हर रोज अपनी जान गवां रहे है लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं हैं। जब वायरस बढ़ रही थी तब देश के ज़िम्मेदार नागरिक प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, राज्य के मुख्यमंत्री की तमाम नेता चुनाव प्रचार करने में व्यस्त थे। क्या उनके लिए लोगों की जान से अधिक कीमती चुनाव जीतना हो गया था। क्या उनके लिए अपने नागरिकों की जान की कोई कीमत नहीं है।

कोरोना संक्रमण का पहला केस 30 जनवरी 2020 को ही आया था उसी दिन विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे विश्व स्वास्थ्य इमरजेंसी घोषित किया था लेकिन केंद्र सरकार और राज्य की तमाम सरकारों ने इसपर क्या काम किया। हर कोई अपनी पीठ थपथपाने में मस्त था। पीएम मोदी तो दुनिया को कह रहे थे की भारत दुनिया को मदद कर रहा है आज ऐसी स्तिथि हो गई की दुनिया भारत की मदद कर रहा है और सरकार खामोश हैं।

सरकार के पास एक साल से अधिक वक्त मिला था हॉस्पिटल, ऑक्सीजन, बेड की व्यवस्था करने के लिए लेकिन सरकार ने क्या किया। पीएम फेयर फंड में पैसा इकट्ठा किया और चुनाव प्रचार? आज हजारों लोग ऑक्सीजन की वजह से जान गवां रहे है इसके लिए कौन जिम्मेदार है? सरकार या कोर्ट? जिसने समय समय पर चुनाव ना रोकने की बात कहीं तो सरकार भी अपनी जिम्मेदारी छोड़ पार्टी प्रचार के लिए जुटे रहे जिसका नतीजा आज देश की जनता को जान देकर चुकानी पड़ रही है देश की अर्थव्यवस्था को खत्म करके चुकानी पड़ रही है। आखिर इन सब का जिम्मेदार कौन?