देश में आजकल निजीकरण का बहुत चर्चा चल रही है सरकार निजीकरण की और कदम बढ़ा रही है. प्रधानमंत्री मोदी का कहना है की सरकार का काम व्यापार करना नहीं है इसलिए हम सरकारी कंपनियों का निजीकरण कर रहे है। आज हम जब निजीकरण की बात कर रहे है तो हमे ये समझना होगा की निजीकरण है क्या? अगर सीधे और सरल शब्दों में हम कहे तो कहा जा सकता है की एक पति के द्वारा अपनी धर्म पत्नी की जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ना। उस पत्नी की जिम्मेदारियां से भागना जिसके लिए वह कसमें खाई है। सात फेरे लिए है। उसी तरह निजीकरण है। कोई भी सरकार अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के लिए संविधान की शपथ लेती है लेकिन अगर जिम्मेदारी भूल कर दूसरों पर आश्रित हो जाए तो यही कहा जा सकता है।

आज हम निजीकरण पर बात कर रहे है तो हमे ये जानना जरुरी है की जनता के लिए सरकारी कंपनियों का निजीकरण कितना सही है तो चलिए आज निजीकरण की शुरुआत बैंकों से करते है। आज केंद्र की सरकार देश की चार बड़ी बैंक को निजीकरण करने जा रही है। इसका एलान अभी हाल में पेश हुए बजट में सरकार ने जिक्र किया है हालाकिं बैंकों के नाम नहीं बताया लेकिन कहा जा है हैं की बैंक ऑफ महाराष्ट्र, बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया शामिल है।

ये सभी बैंक अभी सरकारी है लेकिन सवाल उठता है की सरकार इसको बेच क्यों रही है। क्या इस बैंक से सरकार को घाटा लग रहा है। क्या ये बैंक लोगों को सही तरीके से सर्विस नहीं दे पा रही है। अगर ऐसा है तो जिम्मेदारी किसकी है इसको ठीक करने की। और अगर बैंको का निजीकरण सरकार करेगी तो क्या गारंटी है निजीकरण के बाद लोगों को सर्विस सही तरीके से देगा?

दूसरा सबसे बड़ा सवाल है की आज जब देश की सरकारी बैंकों का एनपीए क़रीब 6 लाख करोड़ से अधिक हो चुका है जो जनता के खून पसीने की गाढ़ी कमाई है उस पैसे को सरकार उन उद्योगपति से वापस नहीं ला पा रही है तो क्या गारंटी है की बैंकों का निजीकरण करने से एनपीए नहीं बढ़ेगा। वहां कौन जिम्मेदारी लेगा आम लोगों के पैसों का?

बैंक का निजीकरण का मतलब सीधा अर्थ होगा जनता के पैसों को उद्योगपति के तिजोरी में जान बूझकर डालना। जिसको वो अपने हिसाब से खर्च सकती है। जैसे मर्जी अपने ही बैंक से कर्ज लेकर उस कर्ज को एनपीए साबित कर देगी। बैंक अपना होगा मैनेजर अपना होगा। कानून अपना होगा। लेकिन पैसा जनता का होगा। डूबेगा जनता का पैसा। जैसा की लक्ष्मी विलास बैंक, Yes बैंक, PMC बैंक में देखने को मिला।

जिस तरह से चाहे उस बैंक का मालिक अपने हिसाब से ब्याज दर बढ़ा कर आम लोगों पर थोप सकता है। तो किस तरह से आम लोगों को निजीकरण से फायदा होगा?

अभी हाल में बैंको के निजीकरण का नुक्सान देखने को मिला लक्ष्मी विलास बैंक में हुआ। निजी बैंक था। सरकार कुछ नहीं कर पाया। लक्ष्मी बैंक को सिंगापुर के एक बैंक डीबीएस बैंक को बेच दिया गया। जिसमे लाखों लोगों का पैसा एक झटके में जीरो बना दिया। शेयर मार्केट से बैठे बिठाए डीलिस्टिंग कर दिया गया जिसके बदले उसके निवेशकों को एक रुपया तक नहीं मिला। ये निजीकरण का नुक़सान है। खासतौर पर बैंक पर तो निजीकरण काफी नुकसान दायक होगा।

अगर हम टेलीकॉम सेक्टर के निजीकरण को देखे तो आज जिस तरह की स्तिथि बन गई है। एक तरह से लोगों को एक रस्सी से बांध दिया गया है। आज से पांच साल पहले लोगों के पास दस पंद्रह कंपनी टेलीकॉम का विकल्प था जिसका इंटरनेट और सिम कार्ड लोगों को मार्केट में मिल जाता था। लेकिन आज सरकार की लापरवाही की वजह से मार्केट में एकाधिकार जियो ने जमा लिया। जिसका नुक़सान अब लोगों को उठाना पड़ रहा है।

आज भी कॉल ड्रॉप की समस्या, इंटरनेट की समस्या है लेकिन लोगों की मजबूरी है दूसरा विकल्प बाजार में नहीं है। ये एक तरह से अलोकतांत्रिक है। लोगों को मजबूर कर देना एक ही प्रोडक्ट को यूज करने के लिए उसके अभिव्यक्ति के आज़ादी पर सीधे तौर पर हमला है। ये सरकार की नाकामी है। आज टेलीकॉम सेक्टर में लोग मजबूर हो चुके है। आज जियो जिस तरह से चाहे आम लोगों पर अपना रेट अपने हिसाब से थोप सकती है और लोग इसका विरोध तक नहीं कर सकते। ये नुक़सान है निजीकरण का।

अगर हम रेलवे, शिक्षा और मेडिकल के क्षेत्र में निजीकरण की बात करे तो ये उससे भी अधिक खतरनाक है। आज भारत के लोगों के लिए रेलवे एक रीढ़ है जिसको लेकर लोगों को ये लगता है की कम पैसे में हम आज देश के एक छोर से दूसरे छोर तक जा सकते है लेकिन निजीकरण से क्या ऐसा संभव हो पाएगा। शायद नहीं। अगर इसका उदाहरण देखे तो तेजस ट्रेन को देख सकते है निजी ट्रेन था। किराया इतना की जैसे हवाई जहाज का हो। नतीजा ये निकला की पैसे वाले लोग तो सफर किए लेकिन गरीब लोगों से दूर हो गया जिसका नतीजा निकला ट्रेन बन्द हो गया।

और इसकी क्या गारंटी है की रेलवे का निजीकरण होने के बाद लोगों को सर्विस अच्छा मिलेगा। क्योंकि जहां तक कुछ प्लेटफॉर्म को निजीकरण की बात की है वहां प्लेटफॉर्म किराया बढ़ गया लेकिन लोगों को सुविधा के नाम पर क्या मिला। जैसा था वैसा ही लेकिन दो रूपए के प्लेटफॉर्म टिकट को कई स्टेशन पर आज तीस रुपए देने पड़ रहे है। क्या ऐसे निजीकरण का फायदा होगा।

वहीं सरकार सड़क, बिजली, जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम, 150 ट्रेन, टेलीकॉम टावर, गैस पाइप लाइन और दिल्ली, बम्बई, बैंगलोर हैदराबाद के हवाई अड्डा बेचने की तैयारी सरकार कर रही है. जबकि दूसरी तरफ देखे तो देश में बेरोजगारी चरम सीमा पर है पिछले 35 सालों में सबसे अधिक वर्तमान समय में हैं दूसरा देश पर कर्ज भी करीब 109 लाख करोड़ के आसपास है
जबकि तमाम आकंड़े बताते है भारत में आज भी गरीबी ओर बेरोजगारी काफी है तो निजीकरण से लोगों को कैसे फायदा मिलेगा। कुल मिलाकर कहा जाए तो निजीकरण आर्थिक गुलामी की और ले जाना है। अगर फिर भी कुछ लोग इसपर तर्क देते हैं की निजीकरण से दूसरा मुल्क जैसे (अमेरिका, चीन) काफी आगे बढ़ा हैं विकास किया लेकिन भारत नहीं किया तो इसपर भी यही कहा जा सकता है सरकार की जिम्मेदारी है उस सरकारी सिस्टम को ठीक करे जहाँ से ये दिक्क़ते आ रही है ना की उसको बेच ही दिया जाए एकाधिकार बना दिया जाए जो बाद में जनता पर ही आर्थिक रूप से प्रहार करे.

(यह लेख दीपक राजसुमन के निजी विचार हैं, दीपक राजसुमन indiantimetv.com और Nationpearl.com के संस्थापक हैं )