बेरोजगारी के ऊपर आज एक रिपोर्ट पढ़ रहा था जिसमें मुझे कई चौंकाने वाली जानकारी मिली है। उस रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में 5500 से अधिक बिजनेस के कॉलेज हैं वहीं अलग अलग विश्वविद्यालयों में 3 करोड़ से अधिक बच्चे पढ़ाई कर रहें है पासआउट हो रहें है लेकिन फिर भी उसमें 93 फीसदी बच्चों को जॉब नहीं मिलती। अगर मिला भी तो 10-15 हजार से अधिक सैलरी नहीं मिलती। जितना एक सिक्योरिटी गार्ड की है। 2017 में Assocham की एक रिपोर्ट सामने आया जिसमें कहा गया कि 58 फीसदी बच्चें तो ऐसे होते है जो कि अपना प्रेजेंटेशन यानि रिसर्च पेपर फेक जमा करते हैं या कहीं से कॉपी पेस्ट करते है। जिसका क्रॉस चेकिंग भी हमारे देश में तमाम कॉलेज और विश्वविद्यालय नहीं करते।

उस रिपोर्ट में भारत के कई बड़े विश्वविद्यालयों की पढ़ाई के गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए लिखा कि अगर आप हावर्ड, स्टैनफोर्ड, वार्टन जैसे विश्वविद्यालयों में पढ़ाई की बात करें तो हावर्ड में पढ़ने वालों बच्चों से केस स्टडी 80 फीसदी करवाते है। 10 फीसदी प्रोजेक्ट्स करवाते हैं और बचा समय 10 फीसदी लेक्चर के रूप में पढ़ाते हैं। वहीं स्टैनफोर्ड और वार्टन में पढ़ने वालों बच्चों से 40 फीसदी केस स्टडी करवाते हैं। 25 फीसदी प्रोजेक्ट के रूप में होता है। 25 फीसदी लेक्चर के रूप में पढ़ाई करवाया जाता है। ये सभी विश्वविद्यालयों का प्रयास रहता है अपने बच्चों को अधिक से अधिक व्यावहारिक रूप से पढ़ाया जाए। मार्केट की डिमांड के हिसाब से पढ़ाया जाए। उसी हिसाब से तैयार किया जाता है। यहां अधिक से अधिक प्रोजेक्ट पर काम करवाया जाता है। बाजार में क्या क्या प्रॉब्लम फेस करना होता है उसपर स्टडी करवाया जाता है। यहां सबसे बड़ी बात ये भी है की यहां के प्रोफ़ेसर की सैलरी भी कम से कम 15 से 17 लाख होते हैं।

लेकिन भारत में उल्टा है यहां सबसे पहले प्रोफेसरों की सैलरी ही काटी जाती है। मास्टर्स के बाद कई कॉलेज फेकल्टीज के नाम पर भर्ती शुरू कर देते हैं। भारत में ओसतन 25 से 30 हजार रुपए एक प्रोफेसर की सैलरी होती है। ये हमारे देश की एजुकेशन सिस्टम की बड़ी प्रॉब्लम है। उस रिपोर्ट में कहा गया कि यहां व्यवहारिक रूप से पढ़ाई कम दी जाती है। यहां के कॉलेजों में लेक्चरो पर अधिक फोकस किया जाता है जबकि मार्केट आज वैसे बच्चों को जॉब देना चाहता है जो एक हो लेकिन काम 5 का कर सके लेकिन भारत में कॉलेजों में जो बच्चे तैयार किए जाते हैं वो 5 मिलकर भी 1 का काम पूरा नहीं कर पाते यही कारण है की देश के कई बड़ी कम्पनियां जिसमें HP, NTPC, Indian Oil, HCL Power Grid ने 28 फीसदी जॉब देना कम कर दिया है। उनका कहना है भारत के तमाम विश्वविद्यालय अपने बच्चों को मार्केट के हिसाब से तैयार नहीं करते उनके भीतर गुणवत्ता की कमी देखी जाती है। कुछ कम्पनियां तो ऐसी है जिसमे गूगल, एप्पल, अल्टियांन, Starbucks, आईबीएम ने अब बिना डिग्री के बच्चों को नौकरी देने की शुरुआत कर दी हैं। उसमें सिर्फ क्वालिटी देखी जा रही है।

कहने को भारत में लिट्रेसी रेट 92 फीसदी है लेकिन जमीनी हकीकत आज भी बहुत दूर है। मार्केट चाहता है गुणवत्ता हो। कॉलेज तैयार करता है डिग्री वाला बच्चा। बाजार उसको जॉब कहां से देगा। देश में अगर जॉब की संख्या बढ़ानी है तो एजुकेशन सिस्टम सुधार करना होगा। सरकारी स्कूलों में एक नॉर्मल टीचर की सैलरी 50/60 हजार कर दी गई है। कॉलेज, विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों की सैलरी आज भी 25/30 हजार हैं कैसे पढ़ाई और गुणवत्ता सुधरेगी। उनके सैलरी बढ़ाई जानी चाहिए। अच्छे प्रोफेसरों की भर्ती होनी चाहिए जो मार्केट की डिमांड के हिसाब से बच्चों से प्रोजेक्ट करवा सके। तैयार कर सके। वरना हम कितनी डिग्री कर ले, डिग्री बांट कर लिट्रेसी रेट बढ़ाते रहें सीना चौड़ा करते रहें बेरोजगारी का कोई समाधान नहीं निकलने वाला।