जब स्वतंत्रता आंदोलन की लड़ाई लड़ी जा रही थी उस समय स्वतंत्रता सेनानियों ने पत्रकार की भूमिका में आकर पत्रकारिता करते हुए देश के लोगों को एकजुट किया। ब्रिटिश सरकार के खिलाफ उन करोड़ो पीड़ित लोगों को आंदोलन में खड़ा किया। लड़ाई लड़ी. कितने पत्रकारों की निष्पक्षता के लिए फांसी पर चढ़ा दी गयी। कई पत्रकारों को देश से निकाला गया। प्रेस को रोका गया। प्रेस को रोकने के लिए पत्रकारों के मुँह को बंद करने के लिए तरह तरह के कानून लाये गए लेकिन फिर भी हमारे देश के पत्रकारों ने अपनी सच्चाई को नहीं छोड़ा और आखिरकार ब्रिटिश सरकार को भारत छोड़ कर भागना पड़ा।

आज देश को आज़ाद हुए 74 साल होने को है और इतने सालों में देश की पत्रकारिता जरूर बदल गयी. पत्रकारिता के सिद्धांत बदल गए। पत्रकारिता की परिभाषा बदल गयी है। आज़ादी के पहले तक पत्रकारिता एक मिशन हुआ करता था लेकिन वर्तमान समय में पत्रकारिता एक व्यवसाय बन चूका हैं और ये लिखते हुए मुझे बहुत दुःख हो रहा हैं क्योंकि मैं भी पत्रकारिता का छात्र हूँ और मेरी भी इस समाज के प्रति, देश के प्रति जिम्मेदारी हैं इसलिए लिखना बहुत जरूरी हो गया। वरना मुझे ऐसा लगेगा की हम भी उनलोगों में शामिल है जो आज पत्रकार के भेष में देश में नफरत बांटने का काम करते है सुबह शाम हिन्दू मुस्लिम के नाम पर झूठ का व्यापार करते है।

वर्तमान समय में अगर हम देखे तो पत्रकारों को दो भागों में बांट दिया गया है एक वो पत्रकार जो सरकार से सवाल करता है दूसरा वे पत्रकार जो सत्ता के हर फैसले को सही ठहराने का काम करता हैं। चाहे वो नए नोट में चिप बताने वाले पत्रकार क्यों ना हो।
आजकल इन पत्रकारों की परिभाषा भी बदल गई है एक वो पत्रकार है जो सरकार से सवाल करते है जनता के मुद्दों को सरकार के सामने रखते है वो या तो विपक्षी समर्थक कहलाते है देशद्रोही, पाकिस्तानी?

और एक वे पत्रकार है जो सरकार के हां में हां मिलाए वो वो देशभक्त और सच्चाई का प्रतीक माना जाता है, ईमानदार पत्रकार माना जाता है क्या ये सही है? हमे आज ये सोचना पड़ेगा की कौन सा पत्रकार सही है? पक्ष वाला या सवाल करने वाला? हम पत्रकारिता की पढ़ाई करते है तो हमें हमारे शिक्षक बताते है जेम्स अगस्ट्स हिकी के बारे में, जेम्स सिल्क बार्किघम के बारे में, गणेश शंकर विद्यार्थी के बारे में, महात्मा गांधी के बारे में, लोकमान्य गंगाधर तिलक के बारे में, राजा राम मोहन राय के बारे में, भगत सिंह के बारे, अज़ीमुल्ला खान के बारे में क्योंकि इनलोगों ने पत्रकारिता को लेकर एक लकीर खींचा था। पत्रकारिता को लेकर इन महान स्वतंत्रता सेनानियों ने कुछ सिद्धांत दिए थे।

इन महान महापुरुषों ने पत्रकारिता को लेकर कहा था की पत्रकार जनता का प्रतिनिधित्व करता है। पत्रकार की मुख्य जिम्मेदारी होती है की वे सरकार को आइना दिखाए। एक पत्रकार को हमेशा सरकार के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए तभी जनता का भला हो सकता है। लेकिन आज परिस्थिति बदल चुकी हैं। आज सरकार की आलोचना यानी देशद्रोह की परिभाषा बन चुकी हैं। विकास विरोधी बन चुकी है जबकि इतिहास को देखें तो आज़ादी के पहले भी और आज़ादी के बाद भी भारतीय पत्रकारिता ने तत्कालीन सरकारों के खिलाफ खुलकर लिखा और सरकार को आईना दिखाने का काम किया।

आज हमे एक आम नागरिक की तरह सोचना चाहिए की एक पत्रकार अगर सरकार से किसी मुद्दे को लेकर सवाल करता है तो वे सवाल भी जनता से जुड़े होते है। जनता के फायदे के लिए होते है। जो आम नागरिक सरकार से नहीं पूछ सकता है वो सवाल सरकार से पत्रकार पूछता है लेकिन आज ऐसी स्तिथि बना दी गई है की सवाल पूछना यानी देश के खिलाफ बोलना, किसी पार्टी का समर्थक बन जाना होता है। आज देश के लोगों ने सोचना छोड़ दिया हैं। अपनी जरूरत की मांग को किसी पार्टी के समर्थन में भूल गया और मांग करने वालों को ही देशद्रोह मान लिया है। विपक्ष मान लिया है। जो बहुत ही दुर्भाग्य की बात है। आज हमे सोचने की जरुरत है।

(ये लेखक दीपक राजसुमन के निजी विचार हैं)