आज पूरा देश भीमराव रामजी आम्बेडकर (बाबा साहेब आम्बेडकर) जी के 130वें जन्मदिवस को मना रहा है. बाबा साहेब का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्यप्रदेश के महू नगर में हुआ था. आज बबा साहेब का जन्मदिन मना रहे है तो आज उनके बारे में यहाँ विस्तार से जान भी लेते है

बाबा साहेब का बड़ा योगदान है हमारे देश के प्रगति में, जाति, भेदभाव, छुआछूत को खत्म करने के दिशा में काम करने को लेकर। बाबा साहेब एक न्यायविधिक, सामाजिक और राजनीतिज्ञ सुधारक थे। उन्हें भारतीय संविधान के पिता के रूप में भी जाना जाता है, वह एक प्रसिद्ध राजनेता और एक प्रतिष्ठित न्यायविद् थे। अछूतता और जाति प्रतिबंध जैसी सामाजिक बुराइयों को खत्म करने के लिए उनके प्रयास उल्लेखनीय हैं।

अपने पूरे जीवन के दौरान, वे दलितों और अन्य सामाजिक पिछड़े वर्गों के अधिकारों के लिए लड़े। बाबा साहेब को जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में भारत के पहले कानून मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया था। 1990 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न, भारत के सर्वोच्च नागरिक के सम्मान से सम्मानित किया गया था।

दलितों के लिए जो बाबा साहेब ने काम किया इसकी शुरुआत उन्होंने बचपन में कर दिया था जब उन्हें जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा। हिंदू मौर जाति के नाम से, उनके परिवार को ऊपरी वर्गों द्वारा “अछूत” के रूप में देखा जाता था। सेना स्कूल में अम्बेडकर को भेदभाव और अपमान का सामना करना पड़ा था सामाजिक आक्रोश से डरते हुए, शिक्षक ब्राह्मणों और अन्य ऊपरी वर्गों के छात्रों से निचले वर्ग के छात्रों के साथ भेदभाव करते थे।

शिक्षक अक्सर अछूत छात्रों को कक्षा से बाहर बैठने के लिए कहते थे। सातारा स्थानांतरित होने के बाद, उन्हें स्थानीय स्कूल में नामांकित किया गया, लेकिन स्कूल बदल देने से भीमराव का भाग्य नहीं बदला। जहां भी वह गये उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ा। अमेरिका से वापस आने के बाद, बाबा साहेब को बड़ौदा के राजा के रक्षा सचिव के रूप में नियुक्त किया गया था, लेकिन वहां भी उन्हें ‘अछूत’ होने के लिए अपमान का सामना करना पड़ा था।

इस बात को लेकर बाबा साहेब के दिलों में हमेशा टिस रही. जबबाबा साहेब को संविधान बनाने का अधिकार मिला तो समाज में फैले उन कुरीतियों को खत्म करने का प्रयास किया। उसको लेकर कानून बनाये गए. दलितों के लिए विशेष अधिकार के रूप में आरक्षण लाया गया.

बाबा साहेब द्वारा लिखे गए भारत का संविधान भी 71 साल हो गया लेकिन दुःख इस बात का है की बाबा साहेब ने देश के लिए, लोगों के लिए जो सपने देखे थे. जो संविधान के जरिये लोगों को मौलिक अधिकार दिए थे. चाहे वह बोलने की आज़ादी हो. लिखने की आज़ादी हो. किसी मुद्दें को लेकर विरोध और समर्थन की आज़ादी हो. आज लोगों के वही मौलिक अधिकार को कुचलने का प्रयास किया जा रहा है.

मौलिक अधिकार वर्तमान समय में ही कुचलने का प्रयास नहीं किया गया बल्कि इससे पहले इंदिरा गाँधी की सरकार ने भी तानाशाही रवैया अपनाते हुए रातो रात आपातकाल लगाकर लोगों को नियत्रंण करने की कोशिश किया था. उनकी अधिकार को कुचलने का प्रयास किया था. पत्रकारों को लिखने बोलने को छीन लिया गया. रातों रात प्रेस पर पाबंदी लगा दी गयी. पत्रकार नेताओ विरोधियों को जेल में डाल दिया गया जो इंदिरा सरकार की आलोचना करते थे.

वर्तमान समय में भी कमावेश ऐसी ही स्तिथि बना दी गयी है. लोगों के मौलिक अधिकार को छिना जा रहा है. चाहे वह जम्मू कश्मीर हो या देश के दूसरे हिस्सों में. सरकार कइ कमियों को उजागर पत्रकारों को जेल में बंद किया जा रहा है. वैसे वैसे बुद्धिजीवी वर्ग को निशाना बनाया जा रहा है जो लोग इस सरकार के नीतियों की आलोचना करते है.

ऐसी ही एक घटना नोटबंदी, जब इसका पीएम मोदी ने का एलान किया तो उसपर पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने कहा था की इस फैसले से भारत की अर्थव्यवस्था खत्म हो जायेगी, जो आज दिख भी दिख रहा है. मनमोहन सिंह के इस बयान पर नरेंद्र मोदी पलटवार करते हुए कहा कि उनके कार्यकाल में इतने भ्रष्टाचार हुए, लेकिन उन पर एक दाग़ तक नहीं लगा. पीएम मोदी ने कहा कि बाथरूम में रेनकोट पहनकर नहाने की कला तो कोई डॉक्टर साहब से सीखे। ये पीएम ने निजी हमला किया था जबकि मनमोहन सिंह एक अर्थशास्त्री हैं इनसे सरकार को बहुत फायदा मिल सकता है लेकिन सरकार निजी हमले करने से वाज नहीं आती.

जम्मू कश्मीर में भी देखा गया जब महबूबा मुफ़्ती, फारूक अब्दुल्ला और उनके बेटे को कई महीनो तक नजरबन्द कर दिया गया. ये वैसा ही था जैसे आपातकाल में इंदिरा गाँधी सरकार ने उस समय के नेताओं के साथ किया था. जम्मू कश्मीर में महीनो तक इंटरनेट बंद रखा गए जबकि इंटरनेट लोगों के मौलिक अधिकार है उनको नहीं छिना जाना चाहिए लेकिन इस सरकार ने किया।

महीनों तक मुस्लिम महिला नागरिकता कानून और NRC के खिलाफ दिल्ली की सड़कों पर धरना देते रहे लेकिन क्या किया गया धर्म के नाम पर सत्ताधारी पार्टी के नेताओ ने देशद्रोही का अड्डा बता दिया। आज किसान सड़कों पर अपनी मांग को लेकर महीनों से आंदोलन कर रहे है लेकिन इन्हे भी खालिस्तानी बताने की कोशिश किया गया. आंतकियों से कनेक्शन बताने की कोशिश की गयी लेकिन उनकी मांगों को नहीं सूना गया.

क्या ये बाबा साहेब के सपनों का भारत है? क्या बाबा साहेब यही दिन देखने के लिए दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान का निर्माण किया? क्या यही दिन देखने के लिए बाबा साहेब ने लोगों को उनके अधिकार दिए. शायद नहीं। लेकिन क्या करे सत्ता के खेल में हमेशा से महापुरुषों के सपने को कुचला गया है ये जनता को समझना पड़ेगा की उनके भी अधिकार है मैं मानता हूँ बचपन से ही स्कूल, कॉलेज में भारतीय संविधान पढ़ाया जाना चाहिए ताकि लोगों के उनके मूल बहुत सुविधाओं का, उनके अधिकारों का हनन नहीं किया जा सके.

(ये लेख दीपक राजसुमन के निजी विचार है)