Anjali Mourya
अंजलि मौर्या गोपाल नारायण सिंह यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता एव जनसंचार की छात्र हैं

अपनी रंगमंचीय समृद्धि के लिए सुख्यात बिहार के कला जगत ने सिनेमा में भी बहुस्तरीय योगदान किया है। निर्माण, निर्देशन अभिनय, गीत, संगीत, पटकथा, संपादन आदि विभिन्न क्षेत्रों में बिहार के विशेषज्ञों तथा कलाकारों ने हिंदी फिल्म जगत में अपनी पहचान बनाई है।

भोजपुरी फिल्म के विकास में तो बिहार के प्रमुख योगदान रहा है। फिल्म के साथ बिहार इस रिश्ते को प्रारंभ बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक से होता है या इतिहास इस दिलचस्प तथ्य से प्रारंभ होता है । कि 14 मार्च 1931 को मुंबई में पहली बार हिंदी फिल्म “आलम आरा” प्रदर्शन का प्रदर्शन हुआ और 1931 की जनवरी में रतन टॉकीज रांची में देव औरंगाबाद बिहार के महाराजा जगन्नाथ प्रसाद सिंह द्वारा निर्माण की गई फिल्म “पुनर्जन्म” का प्रदर्शन हुआ बावजूद इसके यह फिल्म बिहार की सिनेमा यात्रा का पहला कदम नहीं थी।

इसके पूर्व महाराजा जगन्नाथ सिंह में एक देव के “छठ मेले” पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म तैयार की थी कुल 32 दिनों में तैयार उस फिल्म का लेखक निर्माण निर्माण और निर्देशन तीन तीनों महाराजा ने ही स्वयं का स्कोर किया था ! उस फिल्म के निर्माण में गैर बिहारी एकमात्र जर्मन तकनीशियन भ्रूण था।।

आज यानी 2020 ईस्वी में खड़े होकर देखा जाए तो बिहार की फिल्म यात्रा का इतिहास लगभग 78 से 80 वर्ष पूर्व से प्रारंभ होता है महाराजा जगन्नाथ प्रसाद सिंह दिनकर कवि होने के साथ-साथ उच्च कोटि के अभिनेता और निर्देशक भी थे अपने बहनोई गिद्धौर रियासत के राजा गुरु प्रसाद सिंह की प्रेरणा से वह 1924 के लगभग कोलकाता के फिल्म निर्माता धीरे गांगुली से मिलकर और उनकी प्रेरणा से फिल्म तकनीकी की शिक्षा प्राप्त के लिए इंग्लैंड गए वहां से लौट कर उन्हें “छठ मेला “और “पुनर्जन्म” नामक फिल्म बनाई “पुनर्जन्म “का पाठ कथा उनकी ही लिखी हुई थी ।

और फिल्म का निर्देशन धीरेन गांगुली ने किया था उनके उस के तकनीकी पक्ष को जरूर ने संभाला था बाकी सब बिहार के कलाकारों द्वारा बिहार में ही किया गया था फिल्म की शूटिंग गया जिले के विभिन्न स्थानों पर संपन्न हुई थी और संपादन की आधी तकनीकी कार्य राजमहल में स्थित स्टूडियो में किए गए थे उसमें नायक बिलव मंगल की भूमिका के वकील और बिहारी प्रसाद ने निभाई थी।

नायिका चिंतामणि की भूमिका में आरती देवी थी बिलव मंगल के पिता की भूमिका से महाराजा ने निभाई थी और बालकृष्ण की भूमिका में बड़े राजकुमार इंद्रजीत सिंह थे उस फिल्म का छाया छाया अंक ए के सिंह सेन और डेविड ने किया था उस फिल्म निर्माता में नंनीगोपाल भट्टाचार्य ने भी महत्वपूर्ण भागीदारी निभाई थी फिल्म को बिलव मंगल के नाम से ही प्रसिद्धि मिली थी।

बिहार का दुर्भाग्य रहा है कि सन 1934 के भूकंप में स्त्रियों का अधिकांश मूल्यवान सामान नष्ट हो गया और उसी वर्ष महाराजा की अकाल मृत्यु हो गई महाराजा की मृत्यु क्या हुआ कि बिहार में जैसे फिल्म निर्माण की हवा यह चेतना ही लुप्त हो गई बिहार के निवासी निर्माता निर्देशकों द्वारा ढेर सारी भोजपुरी और हिंदी फिल्म बनाई गई है लेकिन बिहार में फिल्म निर्माता का शौक में महाराजा जग महाराजा जगन्नाथ प्रसाद सिंह के किले में साक्षात्कार होने के बाद जो लोग तो हुआ फिर लौटकर वापस नहीं आ सका बिहार के कुछ अंचल स्थानों में शूटिंग हो भले होती रही है परंतु अन्य सारे कार्य संपादित होते हैं मुंबई के ही फिल्म स्टूडियो में।

महाराजा जगन्नाथ प्रसाद सिंह के स्टूडियो के विनाश और उनका निर्धन के उपरांत लगभग तीन दशकों तक बिहार फिल्म निर्माण के क्षेत्र में पराया बना रहा है उसके बाद भोजपुरी फिल्म के दौर एक दौर शुरू होता है जिसमें “गंगा मैया तोहरे तोहे पियरी चढ़ाई” वह निर्माता विश्वनाथ “शाहाबादी “और “लागी नहीं छूटे रामा” जैसे अनेक पर से अच्छी फिल्म बनती रही है हमार संसार तथा विदेशों में भी प्रसिद्धि पाई है परंतु “हे गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ाई” वह और “लागी नहीं छूटे रामा” के गीत संगीत वाले लोकप्रियता आज तक किसी अन्य भोजपुरी फिल्म को प्राप्त नहीं हो पाए हो सकी है

भोजपुरी फिल्म के दूसरे दौर में फिल्म निर्माता के क्षेत्र में अशोक चंद्र जैन और मुक्त नारायण पाठक के अनेक भोजपुरी फिल्म दी थी उस दौर में “गंगा किनारे मोरा गांव” “दूल्हा गंगा पार के”” दंगल” “सुहाग बिंदिया” “आबाद रहे सजनवा के” “बिहारी बाबू”आदि अनेक फिल्म बिहार में ही बनी थी अभिनेता कुनाऌ और उस दौर के भोजपुरी फिल्म फिल्मों के सुपरस्टार बनकर उभरे थे भोजपुरी फिल्म में वर्तमान दौर में मनोज ,विनीत, सहाय सिन्हा, मनोज तिवारी और रवि किशन अभिनय के क्षेत्र में एक ऐसे स्वतंत्र अध्याय का निर्माण करते हैं जिसके अभाव में भारतीय सिनेमा का इतिहास अपंग हो जाता है हो जाएगा

अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फिल्म गांधी के एक छोटे से बिहार अभिनेता स्वर्गीय नूर फातिमा के अभिनय में आसीन प्रसाद पाई है पाई थी संगीतकार चित्रगुप्त और श्याम सागर का योगदान तो सर्व परी है गिरीश रंजन और प्रकाश झा ने निर्माता मूल प्रति “राहुल””गंगाजल” और “अपहरण” के द्वारा फिल्म निर्देशन तथा अपनी प्रकृति अभिरुचि के अनेक नूतन आयाम से हिंदी सिनेमा संसार को परिचित कराया है मोहम्मद रफी मुकेश और किशोर कुमार के बाद हिंदी सिनेमा में प्रसंग गान में सर्व व्यापारी लोकप्रियता प्राप्त करने वाला उदित नारायण का नाम सर्वोपरि रहा है

बिहार की कला भूमि विंध्यांचल की उपाधि “उदित नारायण झा” के गाने में अंतरराष्ट्रीय ख्याति पाई है फिल्म में संपादन का कार्य बड़ा ही महत्वपूर्ण हुआ करता है परंतु संपादन करने वाला कोई प्रसिद्ध नहीं मिलता मिल पाता यही कारण है कि गोमती हारी के श्री घर मिश्र ने हिंदी फिल्मों के बुजुर्ग संपादक से ही एक रह रहे हैं परंतु प्रसिद्धि नहीं पा सके हैं सुपर हिट हिंदी फिल्म “कृष” के “दिल ना दिया गाने” की प्रसिद्धि से सब लोग परिचित हुए परंतु कितने लोग जानते हैं कि उस जीत का रचनाकार अपने बिहार का ही एक युवा कवि विजय अकेला है निर्माण निर्देशन ,अभिनय, पाठ्य ,कथा ,लेखन ,गीत, संगीत ,संपादन, आदि हर क्षेत्र में कितनी महत्वपूर्ण प्रतिभाग भाव का भंडार इस राज्य में सिनेमा उद्योग आज भी क्यों मुंबई के मुखी पर बिहार अच्छी बनी हुआ है! यह सोचने की बात है।

अंजलि मौर्या गोपाल नारायण सिंह यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता एव जनसंचार की छात्र हैं